सन्देश

​अच्छा हुआ ऐ बिस्मिल,

तुम हो नहीं जहाँ में,

होते अगर तो कहते,

“क्यों ख़ाक हो गए हम?”


जिस ख्वाब से मुतासिर,

राह-ए-फ़ना चुनी थी,

वो   मुन्क़लिब हुआ और

अख़लाक़ खो गए हम।


हम मुतमइन इसी से

की सांस ले रहे हैं,

खेतों में अपने देखो ,

यूँ राख बो गए हम।


जंग-ओ-जदल की हसरत,

फिर इब्तिदा हुई है,

मज़हब में डूबते ही

नापाक हो गए हम।


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