सपनों का सच

​रक्त पिपाशू मायावी से ,

 सपने मुझे डराते हैं।

लहू लुहान अंतर को करके, 

क्रंदन मुझे सुनाते हैं।

 मैं यूँ हीं सहमा सा बैठा,

 उनसे भागा जाता हूँ।

ये बातें भयभीत हैं करती, 

सो मैं तुम्हें बताता हूँ।

रात्रि कार छुप जाता जब,

तब अन्धकार बढ़ जाता है। 

ऐसी स्याह सी रातों में,

डर और उमड़ कर आता है।

डर को बढ़ता देख मेरा मन, 

हर क्षण विचलित होता है।

चढ़ते सूरज की आस में पापी, 

सारी रैना रोता है।

रातों की नींदें जब उड़ातीं, 

तब भोर की आस सुहानी है।

ग़र हो सैयम, तब समझो तुम,

सच है ये , नहीं कहानी है।

इस सच को भाषा में बुन पाना, 

सपनों से बईमानी है।

लो पुनः तुम्हे मैं चेत रहा,

सच है ये नहीं कहानी है।

Advertisements

मैं चिराग रहूँगा

ये जो धीरे से छा गयी है ,

बिन बुलाये आ गयी है ।

सारे बदन को कस लिया है जिसने ,

अरमानों को मेरे डंस लिया है जिसने ।

सोचा था बस दिन भर की बात है,

ये भी नसीब में है ,इस से पल भर का साथ है ।

पर कहाँ .. ये तो थम सी गयी है,

रूह की उदासी में रम सी गयी है ।

न जाने कौन बताएगा इसे,

की मेरी सरहद इसका घर नहीं।

जो बे वजह रहबर बन बैठी है ,

इसे बताओ मैं इसका हमसफ़र नहीं।

अब तो लगता है ज़िन्दगी इसके साथ कटेगी, 

न जाने कब ये ज़ालिम रात मेरे काँधे से हटेगी?

सहर की आस है और मैं जाग रहा हूँ,

ये रात पीछे है मैं इस से भाग रहा हूँ।

ये आरज़ू है, तमन्ना है मेरी,

की आफताब का कोई मुझको दीदार करा दे।

ज़िन्दगी भर का नज़ारा नहीं मुमकिन मुझे मालूम,

गर हो सके तो मेरे मुर्शिद बस एक बार करा दे।

सुना है मखमली सा उसका नज़ारा होता है,

कई सदियों का इक पल में गुज़ारा होता है।

इतनी कोशिश मैं करूंगा की रौशन हो लूँ,

खिज़ा की आँधियों में भी गुलशन हो लूँ।

फिर काजल की कोठरी में भी बेदाग़ रहूँगा,

अँधेरे का नहीं डर, मैं चिराग रहूँगा ।।।