ताबीर

इशारों में हमने था सब कुछ कहा,

वो समझने से यूँ हीं मना कर गए।

उम्र भर उनको हमने था चाहा मगर,

वो मोहब्बत में खुद को फ़ना कर गए।

रहबरी की उनसे ही उम्मीद थी,

उनसे मुतासिर जीने की ताबीर थी।

हमने मयस्सर कराया उन्हें ये जहाँ,

वो दफ़्न हसरत-ए-आशना कर गए।

दिल ने मुदर्रिस था माना उन्हें,

उनकी हर बेरुखी में सबब ढूंढता।

पुख्तगी उनकी उनको मुकम्मल लगी,

वो यही सोच के बचपना कर गए।

उनके सहारे यहाँ तक चले आये हैं,

इन चिरागों से उनकी ही बू आती है।

बन रहे थे की गोया समझते नहीं,

मुक़र्रर हमारा फ़साना कर गए।

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सफ़र का प्रवाह।

थम गए, कदम अगर,

जो रुक सी जाती है डगर।

जो रात काली बढ़ रही,

आसमाँ पे चढ़ रही।

जो रेत करवटें लिए,

खेत को निगल रही।

जो भास्कर का ताप अब, 

आसमाँ का श्राप हो।

जो चारों और अब तेरे,

विलाप ही विलाप हो।


न भोर की जो आस हो,

विफल जो हर प्रयास हो।

जो पैर तेरे जड़ गए,

स्वार्थ में जो गड गए।

हवाएँ गर रुला रहीं,

रश्मियाँ सुला रहीं।

तो देख उठ के तू ज़रा,

की क्यों है ऐसा माजरा।

की दम तेरा निकल चुका,

पाषाण मन पिघल चुका ।

फिर क्यों भोर दूर है,

क्यों रात को गुरूर है।

तू पायेगा की वक़्त एक,

रेंगती सी धार है।

है रेत उड़ रही इधर,

उधर मगर बहार है।

इधर उधर के बीच में।

मनुज का नाच हो रहा।

जो जग रहा वो तप रहा,

जो सो रहा वो खो रहा।

जो ज्ञान के प्रवाह को,

पकड़ चुका वो तर गया।

जो क्रोध द्वेष बैर में,

जकड़ चुका वो मर गया।

तो पाश तोड़ द्वेष का,

न वक़्त पे तू क्रोध कर।

जो जल रहा शरीर ये। 

जला के आत्मबोध कर। 

फिर अश्रुओं को पोंछ कर,

स्वेद को निचोड़ दे।

जगा के धुन बढ़न्त की,

नाव अपनी मोड़ दे।

नए प्रवाह से पुनः,

सफ़र पे तू जो बढ़ गया।

तो पायेगा की डूबता ,

तपस वो फिर से चढ़ गया।

…….मुलाकात हुई थी

ज़्यादा वक़्त नहीं बीता है,
उस शाम को जब तुमसे मुलाकात हुई थी ।

तुम्हारे आने से पहले ,
सब वैसा ही था जैसा हुआ करता है,
पुराना मटमैला बेरंग बेस्वाद।
न कुछ ख़ास था न होने की आस थी ,
ज़िन्दगी की कश्ती मंज़िल से दूर मनहूसियत के पास थी।
अचानक कुछ बदला,
डूबता सूरज आफताब हो गया।
अमावस की स्याह रात आनी थी,
हर तरफ महताब हो गया ।
आब-ए-हयात से जो था महरूम,
उस बाग़ में बरसात हुई थी।
नूर ही नूर था,
उस शाम को जब तुमसे मुलाकात हुई थी।

वो शाम मेरे ख़्वाबों में अक्सर आ ही जाती है,
तकिये के नीचे बुदबुदाकर वही किस्सा सुनाती है।
की कैसे तुम बातों में अपनी उलझी हुई थी ,
मेरे दिल में पहेलियाँ बनाकर खुद सुलझी हुई थी।
कि कैसे संदल सी खुशबू लिए तुम भाग रही थी,
पिघले नीलम सा आस्मां था शाम जाग रही थी।
कि अपनी आँखों में तुमने वही काजल लगाया था ,
जिसे तुम आज कल अक्सर लगाना भूल जाती हो।
और हंसी थी तुम खुल कर कई बार उस दिन,
पर अब हंसने में भी तुम तो कई सदियाँ लगाती हो।
ना कुछ सुना ना सोचा ना कोई बात हुई थी ,
बस तुम ही तुम थी
उस शाम को जब तुमसे मुलाकात हुई थी।