ताबीर

इशारों में हमने था सब कुछ कहा,

वो समझने से यूँ हीं मना कर गए।

उम्र भर उनको हमने था चाहा मगर,

वो मोहब्बत में खुद को फ़ना कर गए।

रहबरी की उनसे ही उम्मीद थी,

उनसे मुतासिर जीने की ताबीर थी।

हमने मयस्सर कराया उन्हें ये जहाँ,

वो दफ़्न हसरत-ए-आशना कर गए।

दिल ने मुदर्रिस था माना उन्हें,

उनकी हर बेरुखी में सबब ढूंढता।

पुख्तगी उनकी उनको मुकम्मल लगी,

वो यही सोच के बचपना कर गए।

उनके सहारे यहाँ तक चले आये हैं,

इन चिरागों से उनकी ही बू आती है।

बन रहे थे की गोया समझते नहीं,

मुक़र्रर हमारा फ़साना कर गए।

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हमारा गरीब

​फ़टी झोली में झूमता ,

वो फिर से याद आ गया।

शहरों के भेड़िये जिसे,

गरीब कहते हैं।

कई फ़ाक़े गुज़ार के,

शहर आया था वो लेकिन।

उसे दुत्कारने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

ठिठुरती रात में सोया था वो ,

कुत्तों की मांद में।

उसी की आग छीन कर उसे ,

गरीब कहते हैं।

आसमान की छत तले ,

गुज़ारी ज़िन्दगी उसने।

छतों को बांटने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

मीलों तक उसकी सल्तनत,

 बेबाक फ़ैली थी।

चंद कमरों में कैद हम ,

उसे गरीब कहते हैं।

हर हाथ जो रोटी दे वो,

भगवान् था उसका।

ख़ुदा को बेचने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

निवाला बाँट कर भी भूख ,

अपनी था मिटा लेता।

निवाले छीनने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

चुपचाप मर के ख़ाक बन गया ,

वो एकदिन।

हम मौत से डरकर उसे ,

गरीब कहते हैं।

सुना है उसकी झोली में,

 सारा माल था उसका।

बिना झोली के बैठे हम उसे ,

गरीब कहते हैं।

इस बात पे अक्सर वो ,

मुस्कुरा ही देता था।

की पैदाइशी भूखे उसे ,

गरीब कहते हैं !

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सफ़र का प्रवाह।

थम गए, कदम अगर,

जो रुक सी जाती है डगर।

जो रात काली बढ़ रही,

आसमाँ पे चढ़ रही।

जो रेत करवटें लिए,

खेत को निगल रही।

जो भास्कर का ताप अब, 

आसमाँ का श्राप हो।

जो चारों और अब तेरे,

विलाप ही विलाप हो।


न भोर की जो आस हो,

विफल जो हर प्रयास हो।

जो पैर तेरे जड़ गए,

स्वार्थ में जो गड गए।

हवाएँ गर रुला रहीं,

रश्मियाँ सुला रहीं।

तो देख उठ के तू ज़रा,

की क्यों है ऐसा माजरा।

की दम तेरा निकल चुका,

पाषाण मन पिघल चुका ।

फिर क्यों भोर दूर है,

क्यों रात को गुरूर है।

तू पायेगा की वक़्त एक,

रेंगती सी धार है।

है रेत उड़ रही इधर,

उधर मगर बहार है।

इधर उधर के बीच में।

मनुज का नाच हो रहा।

जो जग रहा वो तप रहा,

जो सो रहा वो खो रहा।

जो ज्ञान के प्रवाह को,

पकड़ चुका वो तर गया।

जो क्रोध द्वेष बैर में,

जकड़ चुका वो मर गया।

तो पाश तोड़ द्वेष का,

न वक़्त पे तू क्रोध कर।

जो जल रहा शरीर ये। 

जला के आत्मबोध कर। 

फिर अश्रुओं को पोंछ कर,

स्वेद को निचोड़ दे।

जगा के धुन बढ़न्त की,

नाव अपनी मोड़ दे।

नए प्रवाह से पुनः,

सफ़र पे तू जो बढ़ गया।

तो पायेगा की डूबता ,

तपस वो फिर से चढ़ गया।