जहाँ दिलकशी तिजारत है,
जहाँ उन्स है , इनायत है,
जहाँ हर रूह की अक़ीदत है,
जहाँ मज़हबों की वसलत है।
कभी आओ,
शाम-ए-लखनऊ का लुत्फ़ भी लो।
यहाँ आब-ओ-हवा में,
आज भी मुहब्बत है।


India’s tryst with it’s Constitution

A very happy republic day to all of you. This is one big story that we should be proud of. Being a Democratic republic for so long, even when the world was not certain about our survival at the time of our inception, is a big achievement. One of the major reasons for our survival is the robust and compassionate nature of our constitution and the amount of faith our founding fathers showed in it. But with the passage of time there have developed certain ambiguities which have slowed down our progress on many spheres.

The increased importance of certain non-constitutional bodies over the constitutional ones, the ineffectiveness of some other constitutional bodies has always been a cause of concern but has not been addressed with full force and resolve.

The three major reasons for our ineffective progress according to me are as follows.

  • The continuance of non-Justiciable nature of Directive Principles of state policy even when the Republic is about to enter its 7th decade is a tragic thing. Dr. B.R Ambedkar remarked “We do not want merely to lay down a mechanism to enable people to come and capture power. The Constitution also wishes to lay down an ideal before those who would be forming the government.  That ideal is of economic democracy”. He was of the view that these principles will be of utmost importance when the time comes for the nation to vote for its government. This has certainly not been the case so far. While Honorable Justice Bhagwati was able to derive legal validity for Free legal aid in India, most of the other aspects of the DPSP have not seen the light of importance.


  • The inefficient working of the third tier; the Panchayati Raj System is a matter of concern. While it all started with a lot of energy and imagination, the journey has been not so great. With most of the population of the nation living in villages, the rural bodies were supposed to be of a great help in installing the ideals of democracy to every corner of the nation. It was supposed to bring down inequalities and promote a sense of belongingness. With the passage of time and the increased influx of funds, this system has been corrupted to its core. There are some instances of beautiful working of the system but they count as exceptions.


  • The not so clear ideal of division of power has been a great obstacle. James Madison remarked “The accumulation of all powers, legislative, executive and judicial in the same hands, whether of one, a few, or many, and whether hereditary, self–appointed, or elective, may justly be pronounced the very definition of tyranny”. While the judiciary has somehow worked its independence out, the executive has been a total slave to the legislatures. The scene gets worse at the level of bureaucracy. It has been debated that this is the situation in Parliamentary form of government and so is the case in India. But we are not the cutout impressions of Great Britain. We have developed a unique system of ours. Our Balancing nature on the Federal-Unitary front shows that the constitution makers did not go for a typecast instead they built it on the principles of equity and justice. George Washington in his Farewell Address remarked “…the habits of thinking in a free country should inspire caution, in those entrusted with its administration, to confine themselves within their respective constitutional spheres, avoiding in the exercise of the powers of one department to encroach upon another. The spirit of encroachment tends to consolidate the powers of all the departments in one, and thus to create, whatever the form of government, a real despotism”. With all those 123 Constitutional amendments one more for a proper demarcation indicating the separation of power should have been enacted.

While there are other lacunae as well but I will try to keep my self-focused on the constitutional aspects.

There is no country in this world which is perfect, no system which is free from ambiguities. What one can wish and try to do is to evolve into something better, something more inclusive and sustainable with every passing day. It’s the pursuit of perfectness which keeps the spark alive in us.


Image source- comparativeconstitutionsproject.org

बड़े शहर

कभी आओ, यहाँ लाशों के मेले रोज़ लगते हैं।

बड़े शहरों के ये घर, अकेले रोज़ लगते हैं।
न हसरत है हवाओं में, न वसलत की है आरज़ू।

न कुछ खोया, न कुछ पाया, न है किसी की जुस्तजू।

कई बेज़ार लम्हों के ये रेले रोज़ लगते हैं।

बड़े शहरों के ये घर,अकेले रोज़ लगते हैं।
दरख्तों पे पड़े झूले यहां बेजान हो गये।

गलियों में बसे बचपन से सब अंजान हो गए।

नसों को चुभ रहे, ऐसे झमेले रोज़ लगते हैं।

बड़े शहरों के ये घर, अकेले रोज़ लगते हैं।
सेहर में आफ़्ताबी ,नगमयी कलियाँ नहीं खिलतीं।

अपने गाँव की मासूम रातें अब नहीं मिलतीं।

मेरे सपनों में ख्वाहिशों के ठेले रोज़ लगते हैं।

बड़े शहरों के ये घर, अकेले रोज़ लगते हैं।
Image source- http://www.hindustantimes.com

अपनी आज़ादी

बाँट कर हमको गए थे,

हुक्मरां तब के मगर।

आज भी हम बंट रहे हैं,

क्या तुझे है ये खबर?

चौक चौराहे पे अक्सर,

ख्वाहिशें दम तोड़ती हैं।

तंग नज़री से मुतासिर,

जल रहा अपना शहर।

जो तब से भूखे सो रहे थे,

मर गए गुमनामियों में।

उनकी लाशों नें खिलाई,

रोटियां हमको मगर।

बाज़ के चंगुल से छूटे,

खुश थे हम ये जान के।

की फूंक कर अपना मकाँ,

अब खो रहे हैं दर-ब-दर।

आज भी मुमकिन है उनके,

ख्वाब का हिन्दोस्तां।

शम्मे आज़ादी के परवाने,

जिए जो मुख़्तसर।

खुल के आज़ादी का मतलब ,

बेड़ियों में ढून्ढ लो तुम।

हाथ वो फिर से उठा लो,

थे जो अबतक बे असर।


​अच्छा हुआ ऐ बिस्मिल,

तुम हो नहीं जहाँ में,

होते अगर तो कहते,

“क्यों ख़ाक हो गए हम?”

जिस ख्वाब से मुतासिर,

राह-ए-फ़ना चुनी थी,

वो   मुन्क़लिब हुआ और

अख़लाक़ खो गए हम।

हम मुतमइन इसी से

की सांस ले रहे हैं,

खेतों में अपने देखो ,

यूँ राख बो गए हम।

जंग-ओ-जदल की हसरत,

फिर इब्तिदा हुई है,

मज़हब में डूबते ही

नापाक हो गए हम।

Image sourcehttp://www.columbiavisuals.com


​सब रोये, सब चीख लिए,

भाषण रैली भी कर आये।

पर मैं तो अब भी मरा पड़ा हूँ,

मेरा तो उपचार करो।

सबने छाती पीट पीटकर,

मौत पे रोटी सेक ली मेरे।

मेरी कब्र पे जीने वालों,

मुझसे साक्षात्कार करो।

मेरी मौत के जलसे  जब जब,

मुल्क में मेरे होते हैं।

मेरे नाम, धर्म, जात पे,

खुल के नेता रोते हैं।

मेरी व्यथा, चिंता, अभिलाषा,

इनको कब सम्मान मिलेगा,

मेरे जैसे कई बचे हैं,

उनका तो उद्धार करो।

पाप की ऐसी रोटी खाकर,

कब तक ज़िंदा भटकोगे?

इक दिन ऐसा आएगा जब,

सबकी आँख को खटकोगे।

तब तख़्त तुम्हार तोड़ेंगे,

और तुमको कहीं न छोड़ेंगे,

अब भी समय बचा है मेरी,

दुविधा का संघार करो।

मैं तो अब भी मरा पड़ा हूँ,

मेरा तो उपचार करो।

Image downloaded from http://www.dailymail.co.uk

ज़मींदोज़ किलकारियाँ।

ये कैसी हवा है आसमाँ धुंधला गया है।

ऐसे वक़्त में न जाने इन्सां कहाँ गया है?

क्यों कोई किसी के दुःख में भी खुश होता है?

क्यों अट्टहास गूंजता है जब सारा जग रोता है?

क्यों सबके मन में एक पापी से मन का घर है?

क्यों मनहूस सा अब हर मोड़, हर मंज़र है?

क्यों भूल गए हैं सब बातें पुरानी?

क्यों सपनों में आती है खून कहानी?

क्यों राम और रहीम अब जुदा जुदा हैं?

क्यों दिल से दूर अब बैठे ख़ुदा हैं?

क्यों हम जो सुन रहे उसपे ही बस यकीन होता?

क्यों अंतर हमारा कहीं दूर ,चुपके से रोता?

क्यों ग़म में भी हम ग़म का हैं फरमान लाते?

क्यों झूठे हो रहे हैं, दिल के होते थे जो नाते?

न सुबह-ए-रौशनी है, न शाम-ए-आरज़ू है।

क्यों मनहूसियत से मुल्क मेरा करता वज़ू है?

क्यों सहर-ए-ज़िन्दगी अब दूर लगती?

क्यों अपनी ख्वाहिश, अब मन में ही मजबूर लगती?

क्यों रातों के अंधेरों में मेरा मन है रोता?

जो ये हो रहा है, आखिर क्यों है होता?

उन मासूम आँखों नें तो कुछ देखा नहीं था,

उन फ़ूल से हाथों नें ज़हर फेका नहीं था।

उन कलियों के पैरों ने अभी चलना था सीखा,

उन नाज़ुक से होंठों पे था किस्सा ज़िन्दगी का।

कोई कैसे उस गुलिस्तां में भी ग़ुस्ताख़ हो जाए?

कोई कैसे बच्चों पे यूँ नापाक हो जाए?

ये आलम हर तरफ हैं, हर जगह आंसू हैं बहते।

हम आप भी देखो न हैं चुप चाप सहते।

अरे ये जानवर जो जागता है, हम सब में है।

इसे खुद से जुदा करना ही हर मज़हब में है।

मज़हब कोई हो,बस इंसानियत सिखाता है।

हर पथिक को स्याह रात में,सूरज दिखाता है।

तो क्यों हम अपने ही मज़हब को यूँ बदनाम करते हैं?

इंसानियत है जो उसे नीलाम करते हैं।

वो जो क़त्ल करता है, वो भी हम में से है,अपना भाई है।

लोचन विहीन है, समझता नहीं की आगे गहरी खाई है।

उसे सम्भाल लो समझा दो इंसानों के जैसे ,

नहीं उसपे बरस जाओ हैवानों के जैसे।

अगर हम सौ को मारेंगे हज़ार और आएंगे।

हर बार ये वहशी दास्ताँ सबको सुनाएंगे।

हैवान को इंसान ही इन्सां बनाता है,

हैवान तो हैवानियत में सब भूल जाता है।

उनके मन में भी तुम ज़िन्दगी का ज्ञान भर दो।

उन्हें फिर से मेरे रहबर , इंसान कर दो।

फिर न बमों का शोर होगा, न होंगी गोलियां।

न खेली जाएंगी सड़कों पे ख़ूनी होलियाँ।

फिर आब-ओ-हवा में प्यार की खुशबू घुली होगी।

जो रात है ना, वो रौशनी से धुली होगी।