अपनी आज़ादी

​बाँट कर हमको गए थे,

हुक्मरां तब के मगर।

आज भी हम बंट रहे हैं,

क्या तुझे है ये खबर?


चौक चौराहे पे अक्सर,

ख्वाहिशें दम तोड़ती हैं।

तंग नज़री से मुतासिर,

जल रहा अपना शहर।


जो तब से भूखे सो रहे थे,

मर गए गुमनामियों में।

उनकी लाशों नें खिलाई,

रोटियां हमको मगर।


बाज़ के चंगुल से छूटे,

खुश थे हम ये जान के।

 की फूंक कर अपना मकाँ,

अब खो रहे हैं दर-ब-दर।


आज भी मुमकिन है उनके,

ख्वाब का हिन्दोस्तां।

शम्मे आज़ादी के परवाने,

जिए जो मुख़्तसर।


खुल के आज़ादी का मतलब ,

बेड़ियों में ढून्ढ लो तुम।

हाथ वो फिर से  उठा लो,

थे जो अबतक बे असर।

सन्देश

​अच्छा हुआ ऐ बिस्मिल,

तुम हो नहीं जहाँ में,

होते अगर तो कहते,

“क्यों ख़ाक हो गए हम?”


जिस ख्वाब से मुतासिर,

राह-ए-फ़ना चुनी थी,

वो   मुन्क़लिब हुआ और

अख़लाक़ खो गए हम।


हम मुतमइन इसी से

की सांस ले रहे हैं,

खेतों में अपने देखो ,

यूँ राख बो गए हम।


जंग-ओ-जदल की हसरत,

फिर इब्तिदा हुई है,

मज़हब में डूबते ही

नापाक हो गए हम।


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उपचार

​सब रोये, सब चीख लिए,

भाषण रैली भी कर आये।

पर मैं तो अब भी मरा पड़ा हूँ,

मेरा तो उपचार करो।


सबने छाती पीट पीटकर,

मौत पे रोटी सेक ली मेरे।

मेरी कब्र पे जीने वालों,

मुझसे साक्षात्कार करो।


मेरी मौत के जलसे  जब जब,

मुल्क में मेरे होते हैं।

मेरे नाम, धर्म, जात पे,

खुल के नेता रोते हैं।

मेरी व्यथा, चिंता, अभिलाषा,

इनको कब सम्मान मिलेगा,

मेरे जैसे कई बचे हैं,

उनका तो उद्धार करो।


पाप की ऐसी रोटी खाकर,

कब तक ज़िंदा भटकोगे?

इक दिन ऐसा आएगा जब,

सबकी आँख को खटकोगे।

तब तख़्त तुम्हार तोड़ेंगे,

और तुमको कहीं न छोड़ेंगे,

अब भी समय बचा है मेरी,

दुविधा का संघार करो।

मैं तो अब भी मरा पड़ा हूँ,

मेरा तो उपचार करो।

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हमारा गरीब

​फ़टी झोली में झूमता ,

वो फिर से याद आ गया।

शहरों के भेड़िये जिसे,

गरीब कहते हैं।

कई फ़ाक़े गुज़ार के,

शहर आया था वो लेकिन।

उसे दुत्कारने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

ठिठुरती रात में सोया था वो ,

कुत्तों की मांद में।

उसी की आग छीन कर उसे ,

गरीब कहते हैं।

आसमान की छत तले ,

गुज़ारी ज़िन्दगी उसने।

छतों को बांटने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

मीलों तक उसकी सल्तनत,

 बेबाक फ़ैली थी।

चंद कमरों में कैद हम ,

उसे गरीब कहते हैं।

हर हाथ जो रोटी दे वो,

भगवान् था उसका।

ख़ुदा को बेचने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

निवाला बाँट कर भी भूख ,

अपनी था मिटा लेता।

निवाले छीनने वाले उसे ,

गरीब कहते हैं।

चुपचाप मर के ख़ाक बन गया ,

वो एकदिन।

हम मौत से डरकर उसे ,

गरीब कहते हैं।

सुना है उसकी झोली में,

 सारा माल था उसका।

बिना झोली के बैठे हम उसे ,

गरीब कहते हैं।

इस बात पे अक्सर वो ,

मुस्कुरा ही देता था।

की पैदाइशी भूखे उसे ,

गरीब कहते हैं !

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सपनों का सच

​रक्त पिपाशू मायावी से ,

 सपने मुझे डराते हैं।

लहू लुहान अंतर को करके, 

क्रंदन मुझे सुनाते हैं।

 मैं यूँ हीं सहमा सा बैठा,

 उनसे भागा जाता हूँ।

ये बातें भयभीत हैं करती, 

सो मैं तुम्हें बताता हूँ।

रात्रि कार छुप जाता जब,

तब अन्धकार बढ़ जाता है। 

ऐसी स्याह सी रातों में,

डर और उमड़ कर आता है।

डर को बढ़ता देख मेरा मन, 

हर क्षण विचलित होता है।

चढ़ते सूरज की आस में पापी, 

सारी रैना रोता है।

रातों की नींदें जब उड़ातीं, 

तब भोर की आस सुहानी है।

ग़र हो सैयम, तब समझो तुम,

सच है ये , नहीं कहानी है।

इस सच को भाषा में बुन पाना, 

सपनों से बईमानी है।

लो पुनः तुम्हे मैं चेत रहा,

सच है ये नहीं कहानी है।

ज़मींदोज़ किलकारियाँ।

ये कैसी हवा है आसमाँ धुंधला गया है।

ऐसे वक़्त में न जाने इन्सां कहाँ गया है?

क्यों कोई किसी के दुःख में भी खुश होता है?

क्यों अट्टहास गूंजता है जब सारा जग रोता है?

क्यों सबके मन में एक पापी से मन का घर है?

क्यों मनहूस सा अब हर मोड़, हर मंज़र है?

क्यों भूल गए हैं सब बातें पुरानी?

क्यों सपनों में आती है खून कहानी?

क्यों राम और रहीम अब जुदा जुदा हैं?

क्यों दिल से दूर अब बैठे ख़ुदा हैं?

क्यों हम जो सुन रहे उसपे ही बस यकीन होता?

क्यों अंतर हमारा कहीं दूर ,चुपके से रोता?

क्यों ग़म में भी हम ग़म का हैं फरमान लाते?

क्यों झूठे हो रहे हैं, दिल के होते थे जो नाते?

न सुबह-ए-रौशनी है, न शाम-ए-आरज़ू है।

क्यों मनहूसियत से मुल्क मेरा करता वज़ू है?

क्यों सहर-ए-ज़िन्दगी अब दूर लगती?

क्यों अपनी ख्वाहिश, अब मन में ही मजबूर लगती?

क्यों रातों के अंधेरों में मेरा मन है रोता?

जो ये हो रहा है, आखिर क्यों है होता?


उन मासूम आँखों नें तो कुछ देखा नहीं था,

उन फ़ूल से हाथों नें ज़हर फेका नहीं था।

उन कलियों के पैरों ने अभी चलना था सीखा,

उन नाज़ुक से होंठों पे था किस्सा ज़िन्दगी का।

कोई कैसे उस गुलिस्तां में भी ग़ुस्ताख़ हो जाए?

कोई कैसे बच्चों पे यूँ नापाक हो जाए?

ये आलम हर तरफ हैं, हर जगह आंसू हैं बहते।

हम आप भी देखो न हैं चुप चाप सहते।

अरे ये जानवर जो जागता है, हम सब में है।

इसे खुद से जुदा करना ही हर मज़हब में है।

मज़हब कोई हो,बस इंसानियत सिखाता है।

हर पथिक को स्याह रात में,सूरज दिखाता है।

तो क्यों हम अपने ही मज़हब को यूँ बदनाम करते हैं?

इंसानियत है जो उसे नीलाम करते हैं।

वो जो क़त्ल करता है, वो भी हम में से है,अपना भाई है।

लोचन विहीन है, समझता नहीं की आगे गहरी खाई है।

उसे सम्भाल लो समझा दो इंसानों के जैसे ,

नहीं उसपे बरस जाओ हैवानों के जैसे।

अगर हम सौ को मारेंगे हज़ार और आएंगे।

हर बार ये वहशी दास्ताँ सबको सुनाएंगे।

हैवान को इंसान ही इन्सां बनाता है,

हैवान तो हैवानियत में सब भूल जाता है।

उनके मन में भी तुम ज़िन्दगी का ज्ञान भर दो।

उन्हें फिर से मेरे रहबर , इंसान कर दो।

फिर न बमों का शोर होगा, न होंगी गोलियां।

न खेली जाएंगी सड़कों पे ख़ूनी होलियाँ।

फिर आब-ओ-हवा में प्यार की खुशबू घुली होगी।

जो रात है ना, वो रौशनी से धुली होगी।

सफ़र का प्रवाह।

थम गए, कदम अगर,

जो रुक सी जाती है डगर।

जो रात काली बढ़ रही,

आसमाँ पे चढ़ रही।

जो रेत करवटें लिए,

खेत को निगल रही।

जो भास्कर का ताप अब, 

आसमाँ का श्राप हो।

जो चारों और अब तेरे,

विलाप ही विलाप हो।


न भोर की जो आस हो,

विफल जो हर प्रयास हो।

जो पैर तेरे जड़ गए,

स्वार्थ में जो गड गए।

हवाएँ गर रुला रहीं,

रश्मियाँ सुला रहीं।

तो देख उठ के तू ज़रा,

की क्यों है ऐसा माजरा।

की दम तेरा निकल चुका,

पाषाण मन पिघल चुका ।

फिर क्यों भोर दूर है,

क्यों रात को गुरूर है।

तू पायेगा की वक़्त एक,

रेंगती सी धार है।

है रेत उड़ रही इधर,

उधर मगर बहार है।

इधर उधर के बीच में।

मनुज का नाच हो रहा।

जो जग रहा वो तप रहा,

जो सो रहा वो खो रहा।

जो ज्ञान के प्रवाह को,

पकड़ चुका वो तर गया।

जो क्रोध द्वेष बैर में,

जकड़ चुका वो मर गया।

तो पाश तोड़ द्वेष का,

न वक़्त पे तू क्रोध कर।

जो जल रहा शरीर ये। 

जला के आत्मबोध कर। 

फिर अश्रुओं को पोंछ कर,

स्वेद को निचोड़ दे।

जगा के धुन बढ़न्त की,

नाव अपनी मोड़ दे।

नए प्रवाह से पुनः,

सफ़र पे तू जो बढ़ गया।

तो पायेगा की डूबता ,

तपस वो फिर से चढ़ गया।