शाम-ए-अवध

जहाँ दिलकशी तिजारत है,
जहाँ उन्स है , इनायत है,
जहाँ हर रूह की अक़ीदत है,
जहाँ मज़हबों की वसलत है।
कभी आओ,
शाम-ए-लखनऊ का लुत्फ़ भी लो।
यहाँ आब-ओ-हवा में,
आज भी मुहब्बत है।

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