अपनी आज़ादी

बाँट कर हमको गए थे,

हुक्मरां तब के मगर।

आज भी हम बंट रहे हैं,

क्या तुझे है ये खबर?

चौक चौराहे पे अक्सर,

ख्वाहिशें दम तोड़ती हैं।

तंग नज़री से मुतासिर,

जल रहा अपना शहर।

जो तब से भूखे सो रहे थे,

मर गए गुमनामियों में।

उनकी लाशों नें खिलाई,

रोटियां हमको मगर।

बाज़ के चंगुल से छूटे,

खुश थे हम ये जान के।

की फूंक कर अपना मकाँ,

अब खो रहे हैं दर-ब-दर।

आज भी मुमकिन है उनके,

ख्वाब का हिन्दोस्तां।

शम्मे आज़ादी के परवाने,

जिए जो मुख़्तसर।

खुल के आज़ादी का मतलब ,

बेड़ियों में ढून्ढ लो तुम।

हाथ वो फिर से उठा लो,

थे जो अबतक बे असर।

Advertisements