तुम्हारा सच

क्यों हो तुम ?

तुम्हारा होना भी क्या होना है।

तुम रही हो हमेशा से,

तुमने होके भी क्या किया , किसको पता।

तुम्हारा होना एक झूठ है, 

इक रात है जिसकी भोर नहीं,

इक दरिया जिसका छोर नहीं।

तुम्हारे होने पे सवाल उठे हैं,

सबने पूछे हैं हमेशा सेे।

तुम माँ हो, बेटी हो, बहु हो, सहेली हो,

लेकिन सच पूछो तो तुम फिर भी अकेली हो।

तुमने जब भी इन किरदारों को लाँघा है,

जब भी समाज से अपना हक़ माँगा है,

सब ने सवालों में घेरा है तुमको,

टटोला है अधिकार तुम्हारा,

तुम पीड़िता हो और रहोगी,

सबके लिए बस इतना है आकार तुम्हारा।

तुम्हारे होने से ही सब हैं,

ये बात हम भूल जाते हैं,

तुमको तुम्हारे होने का एहसास न हो,

इसलिए तुमको डराते हैं, धमकाते हैं।

क्योंकि हम सब खुद डरते हैं,

की कहीं तुम सच जान न लो।

की तुमने बहुत कुछ खोया है सदियों से,

तुम इस बात को मान न लो।

इसलिए तो तुमपे ग़ज़लें बुनी जाती हैं,

तुमपे लिखी कवितायेँ सुनी जाती हैं।

तुम सौम्य हो , कोमल हो, सुन्दर हो,

तुम ज़माने के तानों से टूट जाओगी।

सच तो ये है की हमारा पाषाण भय है, 

आक्रोश की ज्वालामुखी हो तुम, फूट जाओगी।

तुम्हारी शर्म और हया,

ये  तुमको हम बताते हैं।

हम ही लूटते हैं इन्हें,

हम ही इन पे हक़ जताते हैं।

और तुम,

तुम तब भी ऐसी थी,

आज भी ऐसी हो।

किंकर्तव्यविमूढ़।

पर एक आश्वासन देती जाओ,

की तुमने ये जो शुरू किया है,

ये क्रांति जो चलायी है तुमने।

इसे चलने देना,

आँधियाँ बहुत हैं आगे ,

जो दीपक जलाया है उसे जलने देना।

तब कहीं जाके,

कुछ सदियों बाद।

शायद हम तुमको भी इंसान मान लें।

तुम में भी रूह है और उसे दर्द होता है

हम जानवर भी ये बात जान लें।

तब जाके शायद तुम भी,

अपने अधिकारों को खुद चुन सकोगी।

आस्मां से भी ऊँचे, तारों से भी सुन्दर

अपने अतरंगी सपनों को बुन सकोगी।

तो तुम जो भी हो मेरी।

माँ , बहन, बेटी, सहेली।

तुम्हे कसम है दफ़्न की गयीं उन बेजुबानों की

तुम गीतों को उनकेे दिल लगा कर गुन गुनाओगी

तुम्हें करना ही क्या है ऐसे फ़रेबी सहारों का, 

तुम सक्षम हो, अपने दीपक खुद जलाओगी।

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